KASH BANARAS TU YE SMJHA PATA

 

काश बनारस, तू ये समझा पाता

काश बनारस, तू ये समझा पाता,
कि ज़िंदगी आखिर है क्या—
एक मुट्ठी साँसों का हिसाब,
या कुछ अधूरी इच्छाओं की सज़ा?

सुबह-सुबह तेरी गलियों में
जब घंटियों की आवाज़ उतरती है,
और गंगा के माथे पर
सूरज की पहली किरण ठहरती है,
तब लगता है—
शायद ज़िंदगी इतनी भी मुश्किल नहीं,
जितनी हमने अपनी फाइलों,
किस्तों और तारीख़ों में कर दी है।

फिर याद आता है—
ऑफिस की वो अधूरी रिपोर्ट,
बॉस का वो एक और काम,
फोन पर आते लगातार संदेश,
और घर लौटते चेहरे पर
थकान का एक और नाम।

हम दौड़ते रहे उम्र भर—
किसी प्रमोशन के पीछे,
किसी बेहतर कल के पीछे,
किसी ऐसे दिन के पीछे
जिस दिन कह सकें—
"अब सुकून से जी लेंगे।"

पर बनारस,
तू शायद हँसता होगा हम पर।

क्योंकि तेरी गलियों ने देखा है
राजाओं को भी राख होते,
और फकीरों को भी
मुस्कुराते हुए जाते।

तू जानता है—
जिसे हम कामयाबी कहते हैं,
वो अक्सर सिर्फ़
दूसरों की नज़रों में
अपनी कीमत बढ़ाना होता है।

और जिसे हम सुकून कहते हैं,
वो कभी-कभी
गंगा किनारे बैठकर
बिना किसी वजह के
चुप हो जाना होता है।


मणिकर्णिका की आग से पूछता हूँ—
"मौत इतनी डरावनी क्यों है?"

वो बिना बोले कहती है—
डर मौत का नहीं,
उस ज़िंदगी का है
जो तुमने जी ही नहीं।

कितने लोग यहाँ आए होंगे—
कंधों पर अपने,
आँखों में आँसू,
और दिल में अधूरी बातें।

किसी ने पिता को
आख़िरी बार पुकारा होगा,
किसी ने माँ का हाथ
छूटते हुए महसूस किया होगा,
किसी का भाई,
किसी का प्रेम,
किसी का पूरा संसार
एक चिता की आग में
धुआँ बनकर उठ गया होगा।

और फिर भी—
गंगा बहती रही।

नदी ने किसी के लिए
अपना रास्ता नहीं बदला।

शायद यही बनारस का पहला सत्य है—
दुनिया तुम्हारे दुःख पर रुकती नहीं,
इसलिए अपने दुःख में
खुद को रोक मत देना।


काश बनारस, तू ये समझा पाता—
कि खुशी कहाँ रहती है?

किसी महँगी गाड़ी में?
बड़े घर की बालकनी में?
बैंक के खाते में?
या उस कुल्हड़ की चाय में
जिसे दो दोस्त
बिना किसी मकसद के बाँट लेते हैं?

तू शायद कहता—
खुशी कोई मंज़िल नहीं,
बस उन छोटे-छोटे पलों का नाम है
जिन्हें हम
"अभी समय नहीं है"
कहकर खो देते हैं।

किसी माँ की आवाज़,
बच्चे की हँसी,
पत्नी का इंतज़ार,
दोस्त का अचानक फोन,
बारिश में मिट्टी की खुशबू,
और शाम को घर लौटते हुए
किसी अपने का पूछना—

"थक गए?"

बस इतना ही तो था
जिसे हम पूरी ज़िंदगी
महँगी चीज़ों में ढूँढते रहे।


तेरी गलियों में मोह भी है,
तेरी गंगा में वैराग्य भी।

यहाँ कोई कहता है—
"हर हर महादेव!"

और कोई उसी आवाज़ के बीच
अपने भीतर के शोर से लड़ रहा होता है।

कितना अजीब है न बनारस—
यहाँ मृत्यु भी सामने है
और जीवन भी पूरी मस्ती में।

एक तरफ़ चिता जलती है,
दूसरी तरफ़ कोई चाय में
बिस्कुट डुबो रहा है।

कहीं शहनाई बजती है,
कहीं किसी की विदाई।

कहीं प्रेम शुरू होता है,
कहीं कोई प्रेम
गंगा में फूलों के साथ बहा देता है।

और शहर कहता है—
"सब चलता है।"

शायद यही दर्शन है—

जो आया है, जाएगा।
जो मिला है, छूटेगा।
जो दुख है, बीतेगा।
जो सुख है, वो भी ठहरेगा नहीं।
तो फिर किस बात का इतना अहंकार?
और किस बात का इतना शोक?


काश बनारस, तू ये भी समझा पाता—

क्यों इंसान
दूसरों की ज़िंदगी देखकर
अपनी ज़िंदगी से नाराज़ रहता है?

क्यों किसी की तनख्वाह
हमारी खुशी कम कर देती है?

क्यों किसी की सफलता
हमें अपनी हार लगती है?

क्यों हम
अपने हिस्से की धूप छोड़कर
दूसरे की छाँव गिनते रहते हैं?

गंगा शायद कहती—

"तू मेरा पानी मत नाप,
बस बहना सीख।"

क्योंकि नदी कभी नहीं पूछती
कि अगला मोड़ कहाँ होगा।

वो बस चलती है।

पत्थर मिले तो रास्ता बदलती है,
किनारा मिले तो उसे छूती है,
समुद्र मिले तो
अपना नाम खो देती है।

और शायद इंसान की मुक्ति भी यही है—

अपने नाम, अपनी पहचान,
अपनी जीत, अपनी हार
से थोड़ा ऊपर उठ जाना।


कभी-कभी सोचता हूँ,
अगर सच में बनारस बोल पाता
तो मुझसे क्या कहता?

शायद कहता—

"ए बाबू, इतना मत सोच।
ज़िंदगी कोई सरकारी फाइल नहीं
कि हर चीज़ का जवाब चाहिए।"

कुछ सवाल
सिर्फ़ जीने के लिए होते हैं।

कुछ रिश्ते
समझने के लिए नहीं,
निभाने के लिए होते हैं।

कुछ दर्द
इलाज के लिए नहीं,
इंसान बनाने के लिए आते हैं।

और कुछ लोग
हमारी ज़िंदगी में
हमेशा रहने नहीं,
हमें बदलने आते हैं।


तो आज तेरे घाट पर बैठकर
एक बात समझ आई—

जीवन का मतलब
बहुत कुछ पा लेना नहीं है।

जीवन का मतलब शायद ये है कि
जब आख़िरी बार पीछे मुड़कर देखें,
तो अफ़सोस कम हो—

कि काश उस दिन
पापा से थोड़ी और बात कर ली होती,
काश माँ को थोड़ा और गले लगाया होता,
काश दोस्त को माफ़ कर दिया होता,
काश उस प्रेम को
इतना डरकर नहीं जिया होता,
काश छुट्टी सच में छुट्टी की होती,
काश काम के बीच
थोड़ी ज़िंदगी भी जी होती।


और जब आख़िर में
कोई पूछे—

"क्या कमाया?"

तो जेब मत दिखाना।

बस कहना—

कुछ लोगों को दिल से चाहा,
कुछ आँसू चुपचाप पिए,
कुछ सपने पूरे किए,
कुछ अधूरे छोड़ दिए,
कुछ लोगों को माफ़ किया,
कुछ से माफ़ी माँगी,
और जितना समझ आया—

उतना जी लिया।

बाकी...

जो नहीं समझ आया,
वो गंगा के साथ बहा दिया।


काश बनारस, तू ये समझा पाता
कि ज़िंदगी का सबसे बड़ा सच क्या है।

शायद तू मुस्कुराकर कहता—

"सुन बाबू..."

ना तू यहाँ हमेशा रहेगा,
ना तेरी परेशानियाँ।

न नौकरी साथ जाएगी,
न पद, न पैसा।

न वो मकान,
न वो गाड़ी,
न वो दुनिया
जिसे खुश करने में
तूने अपनी आधी उम्र लगा दी।

अंत में बस इतना बचेगा—

किसी की याद में तेरा नाम,
किसी की आँख में तेरी नमी,
किसी के होंठों पर तेरी हँसी,
और शायद किसी दुआ में
तेरा ज़िक्र।

इसलिए—

आज थोड़ा रुक।

गंगा को देख।

साँस ले।

किसी अपने को फोन कर।

चाय पी।

हँस।

रोना आए तो रो।

प्यार है तो कह दे।

माफ़ करना है तो कर दे।

और जो जीवन
तेरे हाथ में अभी बाकी है—

उसे कल के भरोसे मत छोड़।

क्योंकि बनारस ने
हज़ारों साल में एक ही बात सीखी है—

चिता रोज़ जलती है,
गंगा रोज़ बहती है,
सूरज रोज़ उगता है—
बस इंसान ही सोचता रहता है
कि उसके पास
कल भी बहुत समय है।

काश बनारस, तू ये समझा पाता—
कि ज़िंदगी छोटी नहीं है,
हम उसे जीना बहुत देर से शुरू करते हैं।

— Sabyasachi

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