KASH BANARAS TU YE SMJHA PATA
काश बनारस, तू ये समझा पाता काश बनारस, तू ये समझा पाता, कि ज़िंदगी आखिर है क्या— एक मुट्ठी साँसों का हिसाब, या कुछ अधूरी इच्छाओं की सज़ा? सुबह-सुबह तेरी गलियों में जब घंटियों की आवाज़ उतरती है, और गंगा के माथे पर सूरज की पहली किरण ठहरती है, तब लगता है— शायद ज़िंदगी इतनी भी मुश्किल नहीं, जितनी हमने अपनी फाइलों, किस्तों और तारीख़ों में कर दी है। फिर याद आता है— ऑफिस की वो अधूरी रिपोर्ट, बॉस का वो एक और काम, फोन पर आते लगातार संदेश, और घर लौटते चेहरे पर थकान का एक और नाम। हम दौड़ते रहे उम्र भर— किसी प्रमोशन के पीछे, किसी बेहतर कल के पीछे, किसी ऐसे दिन के पीछे जिस दिन कह सकें— "अब सुकून से जी लेंगे।" पर बनारस, तू शायद हँसता होगा हम पर। क्योंकि तेरी गलियों ने देखा है राजाओं को भी राख होते, और फकीरों को भी मुस्कुराते हुए जाते। तू जानता है— जिसे हम कामयाबी कहते हैं, वो अक्सर सिर्फ़ दूसरों की नज़रों में अपनी कीमत बढ़ाना होता है। और जिसे हम सुकून कहते हैं, वो कभी-कभी गंगा किनारे बैठकर बिना किसी वजह के चुप हो जाना होता है। मणिकर्णिका की आग स...